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एकलिंग जी का मंदिर उदयपुर राजस्थान
एकलिंग जी का लाकुलिश मंदिर उदयपुर शहर के निकट नाथद्वारा राजमार्ग पर कैलाशपुरी नामक गांव में स्थित है इसका निर्माण आठवीं सदी में मेवाड़ के गुहिल शासक बप्पा रावल ने करवाया था तथा इसे वर्तमान स्वरूप महाराणा रायमल ने प्रदान किया मंदिर के मुख्य भाग में काले पत्थर से बनी एकलिंग जी की चतुर्मुखी प्रतिमा है एकलिंग जी को मेवाड़ राजघराने का कुल देवता माना जाता है जबकि मेवाड़ का शासक स्वयं को इनका दीवान मानते थे इस मंदिर के अहाते में कुंभा द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर भी है
उदयपुर में स्थित एकलिंग मंदिर लकूली संप्रदाय का सर्वे प्रसिद्ध मंदिर है राणा कुंभा ने इस मंदिर को नागदा कालोडा मालखेड़ा तथा भीमाना गांव भेंट किए उदयपुर के महाराणा ने भगवान एक लिंग को उदयपुर का राजा स्वयं को दीवान मानकर शासन किया
यह मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में मेवाड़ के शासक बप्पा रावल ने उदयपुर कैलाशपुरी में करवाया था
इस मंदिर के संबंध में प्रचलित मान्यता यह है की सातवीं शताब्दी के लगभग यहां बास के वन में एक शिवलिंग था जिसकी अर्चना हरित नामक ऋषि करते थे इस शिवलिंग पर एक गाय हमेशा अपने दूध की धार प्रवाहित करती थी गुहिल वंश के प्रमुख वंशज बप्पा ने यह घटना देखकर हरित ऋषि का शिष्यत्तव ग्रहण किया और उनकी आज्ञा से यह स्थान पर एकलिंग जी का मंदिर बनवाया और उनके आशीर्वाद से मेवाड़ राज्य का विस्तार किया
इस मंदिर की पूजन पद्धति पहले पाशुपत पद्धति के अनुसार रही क्योंकि यहां हरित ऋषि महेश्वरराशि शिवराशि आदि आचार्य पीठासीन रहे जो पाशुपत थे आगे चलकर बनारस से सन्यासी बुलाकर पीठाधीश परंपरा प्रारंभ की इनमें प्रकाशनंद की प्रथम बनारसी सन्यासी थे यहां त्रिकाल पूजा विधि पूर्वक होती है और भोग बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से चढ़ाया जाता है मुख्यमंत्री में पार्वती करती के गंगा यमुना और गणेश की प्रतिमाएं भी है मंडप के मध्य में एक चांदी का नंदीकेश्वर बना हुआ है ऐसी मान्यता है कि जब औरंगजेब की फौज मंदिर को तोड़ने के लिए यहां पहुंची तो इसमें से भोर मधुमक्खी बड़ी संख्या में निकल पड़े और उन्होंने मुगल फौजियों को तीतर भीतर कर दिया आलमगीरनामा से इस प्रांत में मुगल फौजियों की परेशानी का वर्णन मिलता है जो देवी प्रकोप के कारण उत्पन्न हुई थी
